यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: |

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||

 

hawanयज्ञ करके शेष भाग को ग्रहण करनेवाले सज्जन सब पापोंसे मुक्त हो जाते है , किन्तु स्वयं के लिए ही अन्न पकाने वाले पापी लोग पाप का ही भक्षण करते है ।
यज्ञ को केवल क्रिया न समझकर जो मनुष्य शास्त्र का पालन करता है, वो सदैव उन्नति के मार्ग पर बढ़ता जाता है । जो व्यक्ति नियमित रूप से वैदिक परंपरा अनुसार यज्ञ करना चाहता है अथवा कोई नैमित्तिक यज्ञ करना चाहता है उन्हें संस्था पूजन सामग्री, ब्राह्मण एवं परम पावन  नर्मदाजी के तट पर यज्ञ व्यवस्था उपलब्ध कराती है ।

यदि किसीको अपने स्थान पे भी यज्ञ करवाने हो तो संस्था उसमे भी सहायता कराती है ।